Friday, December 23, 2011

पसंद-नापसंद


अल्पकालिक संबंधो में पसंद-नापसंद  वाजिब है, किन्तु 
दीर्घकालिक संबंधो में समर्पण और विश्वास ही मुख्य होता है |
किसी भी रिश्ते को बनाये रखने के लिए 
दोनों ओर से समझौता होते रहना आवश्यक होता है |
जब बात पसंद और नापसंद की आती है तो,
हम अपने पसंद के व्यक्ति की सभी बुराइयों को नज़रंदाज़ कर देते है |
हम उसके लिए कोई भी समझौता करने को तैयार हो जाते है |
जब हमने समझौता करने की ज़िम्मेदारी उठा रखी है तो फिर दूसरे
के द्वारा समझौता किये जाने की शर्त  हम नहीं रख सकते |
आगे जहाँ  तक हमारी हिम्मत होती है,
हम अपने बनाये रिश्ते को समझौता कर-करके बचाते है 
और जब हिम्मत जवाब देने लगती है 
तब हमें अपने फैसले /समझौते पर अफ़सोस होता है |
मगर दोस्तों तब तक बहुत देर हो चुकी होती है | 
वास्तव में जो आपका साथ दे सकते थे उन्हें तो आप  कब के पीछे छोड़ चुके होते है |
संकट के समय जो आपके पास होता है वास्तव में संकट तो उसी के द्वारा पैदा किया गया होता है |
अब फिर आपके पास जो करने को बचता  है वह  होता है  एक और समझौता |
सार- कोई भी दीर्घकालिक सम्बन्ध  समझौता करके मत  बनाइये | 
सही  फैसला  दिल  और दिमाग दोनों के उपयोग  से ही संभव  होता है |


















Wednesday, December 21, 2011

सुकून या जुनून

यदि आप चाहते है की कोई आपको परेशान ना करे,
सुकून एवं शांति से जीवन चलता रहे,
तो अपनी ज़रूरतों को सीमित करना शुरू कर दीजिये | 
हम जैसे-जैसे अपनी ज़रूरतों को 
अपनी मह्त्वकांछाओ को बढ़ाते जाते है,
वैसे-वैसे हमारे सामने चुनौतियों और समस्याओ का 
अम्बार लगना शुरू हो जाता है |
जो  भी आपकी सफलताओ से अपने लिए खतरा महसूस करेंगे,
वे  आपको सुकून से जीने नहीं देंगे | 
कहा भी जाता है की आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है |
जैसे ही आपके सामने कोई समस्या खड़ी होती है 
आप तुरंत ही उसका समाधान ढूंढने में लग जाते है,
और सच मानिये आपसे कुछ ना कुछ नया हो रहा होता है 
जो आपकी छमता को और बढा देता है |
सार यह है कि,
अपनी छमता को बढ़ाते रहने से,
हम भविष्य में आने वाली कठिनाइयों को
हल कर पाने के लिए स्वयं को सदैव सक्षम पायेंगे 
और निडरता एवं आत्मविश्वास से नए कार्यो को हाथ में लेंगे |
 



 



Friday, December 16, 2011

शास. महिला पोलिटेक्निक राजनांदगांव में आयोजित कार्यशाला के विडियो क्लिप

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Monday, December 12, 2011

उद्देश्य

यदि आप अपने उद्देश्यों से अपरिचित है ,
तो आप लोगो के लिए
सिर्फ एक उपयोग की वस्तु रह जाते  है.
यही समय होता है जब आप ठगे जाते है.
लोग आपको अपनी ज़रुरत के अनुसार उपयोग में लेते है,
और छोड़ देते है |
यदि आप अपने उद्देश्यों से परिचित है,
तो आप दुनिया में उपलब्ध संसाधनों का भली-भांति  उपयोग कर पाते है ,
और असफलताओ/उलझनों आदि  से बचे रह पाते है | 


Wednesday, December 7, 2011

स्वयं में बदलाव

आज की पीढ़ी अपने  भविष्य का हर फैसला
स्वयं  से करने में विश्वास करती है |
वे प्रत्येक चीज़ का अनुभव कर लेने की चाह रखते है | 
हम चाहकर भी उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकते है |
व्यक्ति में मौजूद बुरी आदतों या नकारात्मकता  को 
बदलने का प्रयास करने से अच्छा होगा कि 
हम उनमे कुछ नई सोच एवं योग्यताओ को
विकसित करने का प्रयास करे | 
जैसे जैसे उनमे अच्छे बुरे की समझ विकसित होगी वे स्वयं में बदलाव शुरू कर देंगे |

 

Friday, December 2, 2011

स्वयं को पहचाने

जो स्वयं से परिचित नहीं है उसे दूसरो के दिए पहचान से ही काम चलाना पड़ता है|
जब आपको अपना नाम ही नहीं मालूम होगा तो आप किसी भी नाम के पुकारे जाने पर उसे अपना नाम समझ सकते है|
तब सोचे कि प्रत्येक आपको अपनी पसंद का नाम दे रहा होगा |
आपकी असली पहचान का फिर क्या होगा ?
ज्यादातर हम इसी कमजोरी के शिकार है |
स्वयं की योग्यता को नहीं पहचान पाने वाले, उस फुटबाल  की तरह कहे जा  सकते है जिसका अपना कोई लक्ष्य नहीं होता है |
जिसके भी पैरो पर आ जाये वही उसे अपने मकसद के लिए उपयोग करता रहता है |
यदि सचमुच आप स्वयं को अक्लमंद समझते है तो
किसी भी तरह के पूर्वाग्रह का शिकार न होते हुए
अपनी वास्तविक योग्यता को पहचानिए और स्वीकार कीजिये |
यह पहचान आपको अपने अन्दर स्वयं से तलाश करनी होगी | 
ज्यादातर लोग अपनी वास्तविक योग्यता को स्वीकार करने से घबराते है/बचते है 
और यही पर भूल कर जाते है |
क्योकि आपकी वास्तविक योग्यता ही आपको सफल होने में मदद कर सकती है |
जैसे यदि आपने गणित विषय से पढाई की है तो 
आप किसी हॉस्पिटल में चिकित्सक हो जाने के विषय में नहीं सोच सकते |
यदि आप पैरो से चलने में अक्षम है तो आप दौड़ नहीं जीत सकते यह स्वीकार करना ही होगा |
कल्पना आप कर सकते है किन्तु जीवन कल्पनाओ से परे है |
एक न एक दिन आपको सच का सामना करना ही पड़ता है |
फिर क्यों हम स्वयं को धोखे में रखते है?क्यों हमें  लगता है कि हम यह भी कर सकते है,
हम वह भी कर सकते है और अंत में पता चलता है कि
हम कुछ भी सही ढंग से नहीं कर पाए और असफल घोषित हो गए,
फिर क्या करते है ?
जो भी जैसा भी जीवनयापन लायक काम ढूढ़ लेते है 
और सारी जिंदगी अपनी नाकामी का रोना रोते है |
बात-बात पर शिकायत करते है ?
स्वयं से तो कुछ कर नहीं पाए तो औरो को भी नहीं करने के लिए समझाते है,
उन्हें अपनी नाकामी का हवाला देकर दुष्प्रेरित करते है|
सब कुछ जानते हुए भी हम स्वयं पर भरोसा नहीं कर पाते है 
और अपनी असली योग्यता को भूलकर दूसरो की योग्यता को अपनाने के लिए दौड़ पड़ते है
और बस यही पर चूक हो जाती है |
दूसरे की योग्यता  को सही तरीके से अपना नहीं पाने के कारण नुकसान तो होता ही है
साथ ही हम अपनी योग्यता से जो पा सकते थे वह भी हाथ से जाते रहता है |