Thursday, April 25, 2013

सफल कौन?

दुनिया की नजरो में सफल  
ज्यादातर लोग 
अपनी नज़र में असफल होते है।
अच्छी नीयत और आचरण 
हमारी 
सफलता को सुनिश्चित करते है।



Saturday, March 16, 2013

कब सोचेंगे ?

स्वार्थ के बिना व्यवसाय नहीं किया जा सकता और व्यवसाय,
दूसरो के हितो को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता।
कोई भी कार्य जिसमे धन\सम्मान आदि के अर्जन की सम्भावना रहती है,
वहा पर जनहित का दावा खोखला ही साबित होता है।
इन कार्यो को गहराई से देखे तो पाएंगे की कही न कही समाज और मानवता के साथ 
धोखा ही किया जा रहा है।
व्यवसाय करने  वाला,
अपने प्रतिद्वन्दियो  \विरोधियो को लाभ का लालच देकर अपनी तरफ कर लेता है।
आज के गलाकाट प्रतिस्पर्धी समाज में
कोई मजबूर होकर बेईमानी को अपनाता है 
तो कोई थोडा और कमा  लेने का लालच पाले हुए  है। 
आम आदमी की सुरक्षा करने वालो को 
ये व्यवसायी खरीदकर 
अपने व्यवसाय को बढ़ाने  और लाभ कमाने के अलावा और कुछ नहीं सोचते है।
फिल्म जगत,विज्ञापन,सीरियल,पत्रकारिता,न्याय आदि जैसे 
कितने ही सन्दर्भ लिए जा सकते है जो सीधे मानव समाज को प्रभावित करते है।
आम दर्शक अपने अन्दर की कुंठा को मिटाने,
अपने पापी मन को राहत पहुचाने के लिए 
सड़ी-गली और विकृत संस्कृति को दर्शाने वाली 
फिल्मे,सीरियल देख-देखकर संतुष्ट होने का झूठा दावा करते है,
और मौका मिलने पर देखे हुए दृश्यों को 
अपनी असल  जिंदगी में अपनाने से नहीं चूकते।
एक आम आदमी
जिसे अपने घर परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने से ही फुर्सत नहीं होती है,
ऐसे में उसे अच्छे - बुरे की समझ आ पाना बहुत कठिन हो जाता है।
बड़े स्थानों पर बैठे लोगो को इस विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए और अपने स्वार्थ से ऊँचा उठकर 
सीधे मानव को प्रभावित करने वाले विषयों को 
व्यवसायीकरण से बचाना चाहिए।
मै  फिर से दोहराना चाहूँगा कि, 
स्वार्थ के बिना व्यवसाय नहीं किया जा सकता और व्यवसाय,
दूसरो के हितो को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता।



Friday, February 15, 2013

Before Competition Examination ?



प्रतियोगिता परीक्षा में बैठने  से पहले कुछ बाते कुछ विचार।
1. जिस पद के लिए आप परीक्षा देने जा रहे है,
वह पद सचमुच में आपको चाहिए या फिर ऐसे ही अपना लक आजमाने जा रहे है ?
2. अपनी योग्यता से कम के पद पर आवेदन करने से पहले,थोड़ी देर अकेले में बैठे,
और सोचे की आपको ऐसा फैसला क्यों करना पड़ रहा है ?
सबकुछ बटोर लेने की इच्छा / सब हाथ से निकल जाने का भय /वर्तमान का धन अभाव /
दूसरो के परिणाम देखकर अपना आकलन, घर/ परिवार/ दोस्तों के सलाहों का दबाव।
उपरोक्त कारणों से स्वयं को मुक्त रखे तो सफलता की प्रायिकता बढ़ सकती है। 
3. दूसरो की सफलता /असफलता से अपनी योग्यता को मत जाँचिये।
ऐसा  करके कही न कही हम स्वयं को कमज़ोर बना रहे होते है।
4. घरवालो / दोस्तों को दिखाने / झूठा रौब झाड़ने  के लिये परीक्षाये न देते रहे। 
5. परीक्षा फार्म भरने भर से हमारा काम पूरा नहीं हो जाता।
परीक्षा के विषय में पूरी जानकारी रखते हुए तैयारी में अपना पूरा 100% प्रयास लगा दे।
सफलता/असफलता की चिंता हमे हमारे प्रयासों में लापरवाह कर सकता है।ज़रा संभलकर।
6. पहले प्रयास में ही अपना पूरा जोर लगा दे क्योकि अगला प्रत्येक प्रयास हममे हीन भावना/असुरक्षा की भावना  को बढ़ाते जाता है।
विशेष- ऊपर लिखी बातो पर एक बार ज़रूर गंभीरता से विचार कीजियेगा। मै दिल से चाहूँगा कि आपको आपकी पसंद का पद मिले और आप देश के विकास में सहभागी बने। 
  

Tuesday, February 12, 2013

प्रश्न-इतना पढ़ने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती तो पढने से क्या फायदा  ?
उत्तर-
सही प्रश्न-
समस्या यह  नहीं है कि  नौकरी क्यों नहीं मिलती,समझने वाली बात तो ये है कि नौकरी  किसको मिलती है ?
कारण -
वास्तव में हम अपनी पढाई का लक्ष्य ही नौकरी को बना लेते है,और नौकरी के लिये आवश्यक योग्यताओ के अनुसार सर्टिफिकेट्स इकठ्ठा करते चले जाते है।
नौकरी के  लिये आवश्यक योग्यताये,समय के साथ -साथ बदलते चले जाती  है,किन्तु  हम इस बदलाव के साथ अपनी योग्यताओ/सर्टिफिकेट्स को नहीं बढ़ा पाते है।
उम्र बढ़ने के साथ हमारी लालसा बढती/ घटती जाती है और तय नौकरी से कुछ अच्छा या कम  की चाह में लगातार यहाँ-वहा प्रयास करते रहते है।
समय के साथ-साथ हमारी निराशा बढ़ते जाती है,और हम प्रयासों में लापरवाही बरतने लगते  है।
हमसे कम उम्र के प्रतिभागी नई ऊर्जा और
योग्यताओ के साथ प्रतिद्वंदी बनते जाते है,और हमारे लिये प्रतियोगिता कठिन होते चले जाती है। 
सीमित नौकरी और प्रतिभागियों की असीमित संख्या नौकरी को दुर्लभ बना देता है।
अब सबसे महत्वपूर्ण यह कि चूँकि हमने पढाई ही नौकरी पाने के लिए की होती है तो कोई और काम  कर पाने में हम स्वयं को असमर्थ पाते है।
समय निकल जाने के बाद शिकायत और निराशा से भरे हुए कुछ भी करके अपना गुजरा करने के लिए बाध्य हो जाते है।
क्या करे- 
शुरू से पढाई के साथ-साथ कोई तकनीकी ज्ञान भी लेते जाये।
नौकरी को ही लक्ष्य न बनाते हुये स्वतंत्र  कार्य के लिए स्वयं को तैयार करे।
जब हम किसी कार्य में लग जाते है तो और कार्यो /नौकरियों के अधिक प्रस्ताव आने लगते है
और हमारे पास विकल्प आ जाता है कि किस काम को करे / क्या छोड़े।
ज्यादा अच्छा होगा कि अपनी नौकरी की चिंता छोड़ कर दूसरो को नौकरी देने  के बारे में सोचे।  

Friday, November 2, 2012

जब भी पढने बैठता हूँ,मन भटक जाता है ?

सेमिनार में पूछे गए सवाल  
प्रश्न-मै मन से पढाई नहीं कर पाता हूँ ,जब भी पढने बैठता हूँ,मन भटक जाता है।क्या करे ?
उत्तर- बिना उद्देश्य के किसी भी कार्य को पूरे मन से नहीं किया जा सकता।
पढाई का उद्देश्य यदि सिर्फ पास होना है,
तो हम पढाई में अपनी पूरी छमता लगा पाएंगे इसमें शंका है।
यदि किसी विशेष जानकारी के लिए,
किसी बड़ी सफलता के माध्यम के रूप में 
या स्वयं को कही अच्छी जगह पर स्थापित करने के उद्देश्य से 
पढाई की जाये,
तो मन के भटक जाने की समस्या से निजात पा सकते है।
एक बड़ा उद्देश्य, 
राह  की छोटी-छोटी परेशानियों में 
हमारे आत्मविश्वास को बनाये रखता है।
"इसलिए पहले एक बड़े उद्देश्य को सामने रखे,उस उद्देश्य को पूर्ण करने में स्वयं के योगदान का विचार करे और बिना किसी पूर्वाग्रह के पूरे मन से जुट जाये। देखिएगा फिर पढाई भी होगी और पढ़ा हुआ सब याद  भी रहेगा।"

Friday, October 19, 2012

क्या बदला है यह गंभीरता से सोचने का विषय है?



भारत आज भी पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं हो पाया है।
पहले अंग्रेज यहाँ शासन चलाते थे और अब उनकी आत्मा को धारण किये हुए लोग।
अंग्रेजो के द्वारा बनाये गए कितने ही तरीके आज भी अपनाये जा रहे है।
चंद लोग जो किसी भी तरह से आम जनता से चुनकर आ जाते है, वे भी अपनी -अपनी सुविधाओ के हिसाब से 
देश में कानून बनाते और बदलते रहते है।
किन्तु गौर करने वाली बात है कि,
अंग्रेजो के बनाये दमनकारी कानून/ तरीको को 
आज भी कोई बदलने की नहीं सोचता ?
आज भी ज़रुरत बताकर किसी की भी ज़मीन
सरकार के द्वारा छिनी जा सकती है।
हमारी आय में से टैक्स देना निश्चित है  किन्तु 
हमारे नुकसान की भरपाई के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
आज भी आम आदमी,
ऊँचे बैठे लोगो की गुलामी करने के लिए बाध्य है।
अपने परिश्रम से कमाए धन/ज़मीन को 
अपना तब ही  तक कह सकते है,
जब तक कि उस पर किसी 
बाहुबली/ अधिकारी/नेता आदि की नज़र नहीं पड़ी हो।
अंग्रेजो के शासन में भी दबंग लोगो के ठाट थे 
और आज भी इनके ही ठाट है।
क्या बदला है यह गंभीरता से सोचने का विषय है?
अंग्रेजो ने अपनी खिदमत के लिए 
/अपने व्यवसाय को बढ़ाने आदि के लिए 
भारत की आम जनता को ही 
अपनी गुलामी की ज़ंजीरो से जकड़ा था। 
आज भी आम जनता ही 
महंगाई /गरीबी/आधुनिक विलासिता की ज़ंजीरो से
स्वयं को जकड़ा पाती है।
पहले अंग्रेजो ने हमारे देश को लूटा 
और लुटे धन को अपने देश में भेज कर उसे संम्पन्न बनाया।
आज भी हमारा  देश लूटा जा रहा है 
और धन को किसी दुसरे देशो में चोरी-छुपे भेजा जाता है।
आज के लूटेरे किसे संम्पन्न बना रहे है यह शोध का विषय है?
मै सच्चे भारतीय, बड़े अधिकारियो
 /पहुच रखने वालो/ऊँचे पदों पर आसीन सम्मान्नियो और तमाम आम जनता से 
कहना चाहता हूँ कि कोई और हमारी व्यवस्था सुधारने  नहीं आएगा।
अपने स्वार्थ को छोड़कर देश के हित का सोचे।