Tuesday, July 30, 2013
Saturday, May 4, 2013
सुख कहा है ?
सुख कहा है ?
जैसे 1 लीटर दूध को
मीठा करने के लिए उसमे,
चाहे और कितनी ही लीटर ढूध की मिलाई जाये,
वह 1 लीटर दूध कई लीटर बन जाता है किन्तु मीठा नहीं होता।
वही पर उस 1 लीटर दूध में मुठ्ठी भर शक्कर मिला दी जाये
तो दूध,
ठीक इसी तरह
चाहे कितने ही संम्पन्नता आ जाये,
कितनी ही इच्छाओ की पूर्ति कर ले,
कितना ही धन कमा ले,
यह दूध में और दूध मिलाकर उसकी मात्रा बढ़ाने के सामान है।
सुख की चाह,बस चाह ही रह जाती है।
जिस तरह मुट्ठी भर शक्कर मिलाकर दूध को मीठा कर लिया जाता है,
अपने जीवन में मिलाकर सुख को प्राप्त किया जा सकता है।
Thursday, April 25, 2013
Saturday, March 16, 2013
कब सोचेंगे ?
दूसरो के हितो को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता।
कोई भी कार्य जिसमे धन\सम्मान आदि के अर्जन की सम्भावना रहती है,
वहा पर जनहित का दावा खोखला ही साबित होता है।
इन कार्यो को गहराई से देखे तो पाएंगे की कही न कही समाज और मानवता के साथ
धोखा ही किया जा रहा है।
व्यवसाय करने वाला,
अपने प्रतिद्वन्दियो \विरोधियो को लाभ का लालच देकर अपनी तरफ कर लेता है।
कोई मजबूर होकर बेईमानी को अपनाता है
तो कोई थोडा और कमा लेने का लालच पाले हुए है।
आम आदमी की सुरक्षा करने वालो को
ये व्यवसायी खरीदकर
अपने व्यवसाय को बढ़ाने और लाभ कमाने के अलावा और कुछ नहीं सोचते है।
फिल्म जगत,विज्ञापन,सीरियल,पत्रकारिता,न्याय आदि जैसे
कितने ही सन्दर्भ लिए जा सकते है जो सीधे मानव समाज को प्रभावित करते है।
आम दर्शक अपने अन्दर की कुंठा को मिटाने,
अपने पापी मन को राहत पहुचाने के लिए
सड़ी-गली और विकृत संस्कृति को दर्शाने वाली
और मौका मिलने पर देखे हुए दृश्यों को
अपनी असल जिंदगी में अपनाने से नहीं चूकते।
एक आम आदमी
जिसे अपने घर परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने से ही फुर्सत नहीं होती है,
जिसे अपने घर परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने से ही फुर्सत नहीं होती है,
ऐसे में उसे अच्छे - बुरे की समझ आ पाना बहुत कठिन हो जाता है।
बड़े स्थानों पर बैठे लोगो को इस विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए और अपने स्वार्थ से ऊँचा उठकर
सीधे मानव को प्रभावित करने वाले विषयों को
व्यवसायीकरण से बचाना चाहिए।
मै फिर से दोहराना चाहूँगा कि,
स्वार्थ के बिना व्यवसाय नहीं किया जा सकता और व्यवसाय,
दूसरो के हितो को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता।
Friday, February 15, 2013
Before Competition Examination ?
1. जिस पद के लिए आप परीक्षा देने जा रहे है,
वह पद सचमुच में आपको चाहिए या फिर ऐसे ही अपना लक आजमाने जा रहे है ?
2. अपनी योग्यता से कम के पद पर आवेदन करने से पहले,थोड़ी देर अकेले में बैठे,
और सोचे की आपको ऐसा फैसला क्यों करना पड़ रहा है ?
सबकुछ बटोर लेने की इच्छा / सब हाथ से निकल जाने का भय /वर्तमान का धन अभाव /
उपरोक्त कारणों से स्वयं को मुक्त रखे तो सफलता की प्रायिकता बढ़ सकती है।
3. दूसरो की सफलता /असफलता से अपनी योग्यता को मत जाँचिये।
ऐसा करके कही न कही हम स्वयं को कमज़ोर बना रहे होते है।
4. घरवालो / दोस्तों को दिखाने / झूठा रौब झाड़ने के लिये परीक्षाये न देते रहे।
5. परीक्षा फार्म भरने भर से हमारा काम पूरा नहीं हो जाता।
सफलता/असफलता की चिंता हमे हमारे प्रयासों में लापरवाह कर सकता है।ज़रा संभलकर।
6. पहले प्रयास में ही अपना पूरा जोर लगा दे क्योकि अगला प्रत्येक प्रयास हममे हीन भावना/असुरक्षा की भावना को बढ़ाते जाता है।
विशेष- ऊपर लिखी बातो पर एक बार ज़रूर गंभीरता से विचार कीजियेगा। मै दिल से चाहूँगा कि आपको आपकी पसंद का पद मिले और आप देश के विकास में सहभागी बने।
Tuesday, February 12, 2013
प्रश्न-इतना पढ़ने के बाद भी नौकरी नहीं मिलती तो पढने से क्या फायदा ?
उत्तर-
सही प्रश्न-
समस्या यह नहीं है कि नौकरी क्यों नहीं मिलती,समझने वाली बात तो ये है कि नौकरी किसको मिलती है ?
कारण -
वास्तव में हम अपनी पढाई का लक्ष्य ही नौकरी को बना लेते है,और नौकरी के लिये आवश्यक योग्यताओ के अनुसार सर्टिफिकेट्स इकठ्ठा करते चले जाते है।
नौकरी के लिये आवश्यक योग्यताये,समय के साथ -साथ बदलते चले जाती है,किन्तु हम इस बदलाव के साथ अपनी योग्यताओ/सर्टिफिकेट्स को नहीं बढ़ा पाते है।
उम्र बढ़ने के साथ हमारी लालसा बढती/ घटती जाती है और तय नौकरी से कुछ अच्छा या कम की चाह में लगातार यहाँ-वहा प्रयास करते रहते है।
समय के साथ-साथ हमारी निराशा बढ़ते जाती है,और हम प्रयासों में लापरवाही बरतने लगते है।
हमसे कम उम्र के प्रतिभागी नई ऊर्जा और
योग्यताओ के साथ प्रतिद्वंदी बनते जाते है,और हमारे लिये प्रतियोगिता कठिन होते चले जाती है।
योग्यताओ के साथ प्रतिद्वंदी बनते जाते है,और हमारे लिये प्रतियोगिता कठिन होते चले जाती है।
सीमित नौकरी और प्रतिभागियों की असीमित संख्या नौकरी को दुर्लभ बना देता है।
अब सबसे महत्वपूर्ण यह कि चूँकि हमने पढाई ही नौकरी पाने के लिए की होती है तो कोई और काम कर पाने में हम स्वयं को असमर्थ पाते है।
समय निकल जाने के बाद शिकायत और निराशा से भरे हुए कुछ भी करके अपना गुजरा करने के लिए बाध्य हो जाते है।
क्या करे-
शुरू से पढाई के साथ-साथ कोई तकनीकी ज्ञान भी लेते जाये।
नौकरी को ही लक्ष्य न बनाते हुये स्वतंत्र कार्य के लिए स्वयं को तैयार करे।
जब हम किसी कार्य में लग जाते है तो और कार्यो /नौकरियों के अधिक प्रस्ताव आने लगते है
और हमारे पास विकल्प आ जाता है कि किस काम को करे / क्या छोड़े।ज्यादा अच्छा होगा कि अपनी नौकरी की चिंता छोड़ कर दूसरो को नौकरी देने के बारे में सोचे।
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